हमारे आदर्श

हमारे आदर्श भारत वर्ष के महान नायक

(1398-1494)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,  जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कबीर दास

(1450-1520)

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस |  कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास |

रविदास

(1511-1623)

तुलसी मीठे बचन  ते सुख उपजत चहुँ ओर |  बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर |

तुलसी दास

345-297BC

जीवन में एक बार जो फैसला कर लिया तो फिर पीछे मुडकर मत देखो, क्योंकि पलट-पलट कर देखने वाले इतिहास नहीं बनाते |

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

304-232BC

प्रत्येक समय मैं चाहे भोजन कर रहा हूँ या शयनागार में हूँ, प्रतिवेदक प्रजा की स्थिति से मुझे अवगत करें। मैं सर्वत्र कार्य करूंगा प्रजा हित मेरा कर्तव्य है और इसका मूल उद्योग तथा कार्य तत्परता है।

सम्राट अशोक

375-283BC

शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है. शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है ।

कौटिल्य (चाणक्य)

1540-1579

ये संसार कर्मवीरो की ही सुनता है। अतः अपने कर्म के मार्ग पर अडिग और प्रशस्त रहो ।

महाराणा प्रताप

1630-1680

सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता.पिता, फिर परमेश्वर।अतः पहले खुद को नही राष्ट्र को देखना चाहिए ।

शिवाजी महाराज

1666-1708

सबसे महान सुख और स्थायी शांति तब प्राप्त होती है जब कोई अपने भीतर से स्वार्थ को समाप्त कर देता है ।

गुरू गोबिन्द सिंह
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