यात्रा

समर्पण, सहयोग तथा नेतृत्व की अद्वितीय क्षमता : केशव प्रसाद मौर्य

1989 से भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हुई । ये दौर गठबंधन सरकारों का था। दूसरे शब्दों में 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में दो बड़े परिवर्तन आये-प्रथम, केंद्र में गठबंधन सरकारों का गठन एवं द्वितीय, अयोध्या में राममंदिर निर्माण के मुद्दे को गति मिलना। इन दोनों मुददों ने भारतीय राजनीति की दशा एवं दिशा को परिवर्तित कर दिया जिसका प्रभाव केशव पर व्यापक रूप से पड़ा । इसी समय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण पर बनी मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर दिया । इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई । इससे कुछ वर्ष पूर्व फरवरी 1986 में फैजाबाद की जिला अदालत के आदेश के बाद बाबरी मस्जिद का दरवाजा खोल दिया गया। केशव प्रसाद मौर्य भी इसी बदलते राजनीतिक परिवेश में बड़े हो रहे थे और इन सभी राजनीतिक घटनाओं ने उनके अन्दर हिन्दू धर्म के प्रति सेवा भाव को जागृत किया। इसके पश्चात् उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) एवं विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) के कार्यक्रमों में जाना शुरू किया। उस दौर में उनके परम मित्रों में से एक डॉ. बद्री विशाल त्रिपाठी जी के साथ उन्होंने संगठन के कार्यों एवं शाखाओं में प्रतिभाग लेना प्रारंभ किया। केशव के प्रत्येक दिन की शुरुआत विहिप के कार्यक्रमों से ही होती थी ।

1 फरवरी 1986 में फैजाबाद की जिला अदालत के आदेश के विरुद्ध व्यापक आन्दोलन की शुरुआत हुई जिसमें केशव ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया.

केशव प्रसाद मौर्य अशोक सिंघल जी के साथ

माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात ही केशव प्रसाद मौर्य की मुलाकात विहिप के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मा0 अशोक सिंघल जी से हुई। इसके पश्चात वर्ष 1989 से संघ व विहिप के अनेक दायित्वों का निर्वहन करते हुए उनका अधिकांश समय साधु-संतों के बीच ही व्यतीत हुआ करता था । इस दौरान उन्होंने स्वयं को विहिप के संस्कारों से परिपूर्ण किया। विहिप के सभी भजन-कीर्तन, सत्संग एवं सगोष्ठियों में केशव जी हमेशा बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। शुरुआती दिनों में उनका सबसे ज्यादा संपर्क विहिप के वरिष्ठ प्रचारक एवं विहिप के संगठन मंत्री माननीय श्री ठाकुर गुरजन सिंह जी से अधिक था, माननीय श्री ठाकुर गुरजन सिंह जी के मार्गदर्शन में केशव संगठन के कार्य किया करते थे। इस दौरान संगठन का एक गीत केशव जी हमेशा गुनगुनाया करते थे:

"संगठन तुम बढ़े चलो पंथ पर चले चलो
भला हो जिसमे देश का वह काम किए चलो"

संगठन के प्रति इनके कार्यों, ईमानदारी, निष्ठा एवं कठोर परिश्रम से प्रभावित होकर विहिप ने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की विशेष जिम्मेदारी केशव को सौंपी गयी । श्री राम जन्म भूमि आंदोलन की विभिन्न यात्राओं जैसे श्रीराम ज्योति, शिला पूजन आदि के संचालन के लिए केशव प्रसाद मौर्य को नियुक्त किया । श्रीराम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने के लिए उन्होंने भी जन-जागरण आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । ''इनके कुशल नेतृत्व को देखते हुए संगठन ने उन्हें 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवकों के जत्थे की अगुवाई के लिए चुना । जहाँ पर केशव ने अपने सुझबुझ, कार्य कुशलता एवं नेतृत्व से प्रशासन ने इनके सामने घुटने तक टेक दिए । ''

श्रीराम ज्योति शिला यात्रा के साथ फोटो संचालन के लिए केशव प्रसाद मौर्य को नियुक्त किया । श्रीराम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने के लिए उन्होंने भी जन-जागरण आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । इनके कुशल नेतृत्व को देखते हुए संगठन ने उन्हें 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवकों के जत्थे की अगुवाई के लिए चुना । जहाँ पर केशव ने अपने सुझबुझ, कार्य कुशलता एवं नेतृत्व से प्रशासन ने इनके सामने घुटने तक टेक दिए ।

1990 के ही दशक में केशव बजरंग दल द्वारा गठित विभिन्न यात्राओं की युवा टोलियों की सुरक्षा के प्रमुख हुआ करते थे । 1992 के समय केशव अयोध्या प्रांतीय संगठन मंत्री के तौर पर विभिन भूमिकाओं का निर्वाह करते हुए अवध क्षेत्र में श्री राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्षरत रहे । सन 1992 अयोध्या का ही एक प्रकरण है जब पूर्व डीजीपी और पूर्व सांसद श्रीश चंद्र दीक्षित जो की बहुत ही वयोवृद्ध थे उनकी इच्छा थी कि वह राम जन्मभूमि को अपनी आंखों से देखें. जिसके लिए केशव ने उनको राम जन्मभूमि के दर्शन कराने का दृढ़ निश्चय किया । उनके संगठनात्मक कार्य-कुशलता एवं जुझारू तेवर के आगे प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें अनुमति प्रदान की गई । केशव ने 1997- 1998 में विश्व हिन्दू परिषद् के दिल्ली के संगठन मंत्री के पद को सुशोभित किया |

गौरक्षा के विषय पर केशव का संघर्ष अतुलनीय रहा है और प्रयाग में हुए ऐसे संघर्षों में इनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है । राम जन्म भूमि के लिए जो कारसेवा चल रही थी इसमें लोगों को भोजन, ठहरने आदि की व्यवस्था करना और यही नहीं रचनात्मक कार्यों में जैसे कुंभ और अर्धकुंभ में भी केशव जी की भूमिका बहुत ही सराहनीय रही है । कई महत्वपूर्ण अवसरों पर साधु- संतो के साथ मिलजुल कर कार्य करते हुए उनके दैनिक आवश्यकताओं की व्यवस्था शीघ्रता से किया करते थे ।

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